– डा. रजनीकांत शुक्ला

​भारतीय प्राच विद्या सोसायटी, कनखल के ज्योतिषाचार्य डॉ. प्रतीक मिश्रपुरी ने इस वर्ष की दीवाली की तिथि को लेकर विद्वानों में मत भिन्नता होने की बात कही है। उनका कहना है कि करीब 62 वर्षों में ऐसी स्थिति बनती है जब तिथि के कारण दीवाली के त्यौहार को लेकर अलग-अलग मत होते हैं, जैसा कि 1962 और 1963 में हुआ था।

​21 अक्टूबर को दीवाली क्यों?

​डॉ. मिश्रपुरी के अनुसार, इस बार भी दीवाली की तिथि को लेकर मतभेद है कि यह 20 अक्टूबर को हो या 21 अक्टूबर को। वह 21 अक्टूबर को दीवाली मनाए जाने के पक्ष में हैं।

​इसका मुख्य आधार एक ज्योतिषीय सूत्र है जिसके मुताबिक जब प्रतिपदा का मान अमावस्या और चतुर्दशी से ज्यादा होता है, तो प्रतिपदा से युक्त दीवाली मनाई जाती है।

  • ​इस बार अमावस का कुल मान 26 घंटे 10 मिनट तक है।
  • प्रतिपद़ा इससे अधिक, 26 घंटे 20 मिनट तक रहेगी।
  • ​इसलिए, 21 अक्टूबर को प्रतिपद युक्त अमावस्या में दीवाली मान्य होगी, 20 को नहीं।

​इसके अतिरिक्त, एक मान्यता यह भी है कि जिस तिथि में ब्राह्मण सूर्य को अर्घ्य दें, क्षत्रिय वादी-प्रतिवादी का फैसला सुनाए, वैश्य अपनी दुकान खोलें और ग्वाला अपनी गायों को लेकर वापस घर पर आए— यदि यह सभी कार्य एक ही तिथि अमावस्या में हो, तो उसी दिन दीवाली मनाई जाती है। डॉ. मिश्रपुरी के अनुसार, यह सभी कार्य 21 अक्टूबर को हीं संभव हैं।

​पूजन का शुभ समय

गृहस्थ लोगों को 21 अक्टूबर को दीवाली पूजन करना चाहिए। दीवाली पूजा सूर्य अस्त (17:40) के बाद 2 घंटे 24 मिनट तक, यानी लगभग 8:04 बजे सायं काल तक किया जा सकता है। उन्होंने 19:15 से 20:30 तक लाभ की चौघड़िया में लक्ष्मी पूजन करने को शुभकारी बताया है।

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