आज 8 जुलाई, 2025 को भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी की 18वीं पुण्यतिथि है। इस अवसर पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जा रही है – सुनील पांडेय

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की 18वीं पुण्यतिथि पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई। 8 जुलाई, 2025 को उन्हें “जननायक” के रूप में याद किया गया, जिनके जीवन और दर्शन उनके ही कथन “चाह गई चिंता मिटी मनुआ बेपरवाह जाको कछु ना चाहिए वो शाहन के शाह” में निहित थे।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता द्वारिका प्रसाद और राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश जैसे गणमान्य व्यक्तियों ने चंद्रशेखर के व्यक्तित्व और उनकी आदर्शवादी राजनीति पर प्रकाश डाला। हरिवंश ने अपनी पुस्तक का शीर्षक “चंद्रशेखर: द लास्ट आइकन ऑफ आइडियोलॉजिकल पॉलिटिक्स” (चंद्रशेखर: आदर्शवादी राजनीति के अंतिम प्रतीक) रखा है, जबकि विदेशी लेखक रोड्रिक मैथ्यू ने “सिक्स मंथ्स दैट सेव्ड इंडिया” (चंद्रशेखर के 6 महीने जिसने भारत को बचाया) में उनके प्रधानमंत्री काल के महत्वपूर्ण निर्णयों का विश्लेषण किया है।
सिद्धांतों से प्रेरित जीवन और निर्भीक आवाज
चंद्रशेखर का जीवन नानक, बुद्ध, गांधी, आचार्य नरेंद्र देव और जयप्रकाश नारायण जैसे महापुरुषों से प्रेरित था। उन्होंने अपनी वैचारिक समझ से कभी समझौता नहीं किया और बड़ी से बड़ी राजनीतिक हस्तियों के समक्ष अपनी राय स्पष्ट रूप से रखी। आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी के विरोध में उनका कड़ा रुख इसका प्रमाण है। स्वर्ण मंदिर की घटना और राजीव गांधी के श्रीलंका मिशन पर उनकी टिप्पणियाँ उनकी दूरगामी दृष्टि और निर्भीकता को दर्शाती हैं। उन्होंने धर्म और राजनीति के घालमेल को देश के लिए अत्यंत घातक बताया था।
एक समाजवादी, जन-केंद्रित नेता
चंद्रशेखर का राजनीतिक जीवन क्रांति और समाज रचना से जुड़ा था। वे सत्ता साधने के लिए राजनीति में नहीं आए, बल्कि लोक शक्ति को परिवर्तन की अंतिम निर्णायक शक्ति मानते थे। उनके निकट सहयोगी और “गांधीनिष्ट समाजवादी” सूर्य कुमार बताते हैं कि चंद्रशेखर ने उन्हें सिखाया कि जुनून के बिना राजनीति निरर्थक है, करुणा के बिना नीति व्यर्थ है, और अपने से कम सुविधा प्राप्त लोगों के प्रति दयालुता स्वाभाविक होनी चाहिए।
संक्षिप्त जीवनी:
चंद्रशेखर का जन्म 17 अप्रैल, 1927 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के इब्राहिमपत्ती गांव में एक किसान परिवार में हुआ था। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में मास्टर डिग्री प्राप्त की। छात्र जीवन से ही समाजवादी आंदोलन में सक्रिय रहे और आचार्य नरेंद्र देव से घनिष्ठ संबंध बनाए। उन्होंने प्रजा समाजवादी पार्टी में विभिन्न पदों पर कार्य किया और 1962 में राज्यसभा के लिए चुने गए। जनवरी 1965 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए और “युवा तुर्क” नेता के रूप में उभरे। उन्होंने साप्ताहिक पत्रिका ‘यंग इंडियन’ (दिल्ली) की स्थापना की। आपातकाल के दौरान उन्हें गिरफ्तार किया गया और उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ ‘मेरी जेल डायरी’ और ‘सामाजिक परिवर्तन की गतिशीलता’ हैं। 1983 में उन्होंने कन्याकुमारी से नई दिल्ली तक लगभग 4260 किलोमीटर की “भारत यात्रा” पदयात्रा की। वे 1962 से 1984-89 की संक्षिप्त अवधि को छोड़कर संसद सदस्य रहे और 1989 में बलिया से लोकसभा चुनाव जीते। उनका विवाह श्रीमती दूजा देवी से हुआ और उनके दो पुत्र – पंकज और नीरज हैं।
चंद्रशेखर एक ऐसे नैतिक और संस्कारिक व्यक्ति थे जिनकी कृतित्व और व्यक्तित्व से सभ्य बनने की प्रेरणा हमेशा प्रवाहित होती रहेगी।

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