हरिद्वार/लूटन (यूके)। भारत की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति न्यूरोथेरेपी ने यूनाइटेड किंगडम के प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी ऑफ़ बेडफ़ोर्डशायर में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में अपनी पहचान बनाई है। इंटरनेशनल कॉन्फ़्रेंस ऑन ह्यूमन राइट्स, सस्टेनेबिलिटी एंड क्लाइमेट चेंज में पहली बार न्यूरोथेरेपी को सतत स्वास्थ्य देखभाल मॉडल के रूप में बीस देशों के प्रतिनिधियों के समक्ष प्रस्तुत किया गया।
लाजपत राय मेहरा न्यूरोथेरेपी शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान (एल एम एन टी आर टी आई) के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामगोपाल परिहार ने “सस्टेनेबल हेल्थकेयर थ्रू इंडिजिनस नॉलेज सिस्टम्स: अ केस फॉर योगा एंड न्यूरोथेरेपी” शीर्षक से अपना शोध प्रस्तुत किया।
शोध के मुख्य निष्कर्ष:
शोध में सामने आया कि योग और न्यूरोथेरेपी का संयोजन स्वास्थ्य के साथ-साथ पर्यावरण और अर्थव्यवस्था के लिए भी फायदेमंद है। प्रमुख तथ्य इस प्रकार हैं:
- मरीजों में 69% तक दर्द की कमी दर्ज की गई।
- दवाओं पर निर्भरता में 87% तक की कमी आई।
- उपचार का कार्बन प्रभाव 72% कम रहा और इलाज की लागत लगभग 68% सस्ती पाई गई।
परिहार ने न्यूरोथेरेपी को कौशल-आधारित रोजगार का एक बड़ा माध्यम बताया, जो लाखों युवाओं को आत्मनिर्भर बना सकता है। संस्थान के पदाधिकारियों और अखिल भारतीय न्यूरोथेरेपी संगठन ने इस वैश्विक मान्यता को “गर्व का क्षण” बताया।
यूनिवर्सिटी ऑफ़ बेडफ़ोर्डशायर ने इस शोध को कैम्ब्रिज स्कॉलर्स पब्लिशर्स की पुस्तक में भी प्रकाशित करने के लिए आमंत्रित किया है, जो न्यूरोथेरेपी के लिए एक ऐतिहासिक शैक्षणिक कदम है। इस अंतरराष्ट्रीय पहचान ने न्यूरोथेरेपी को “मेड इन इंडिया स्वास्थ्य देखभाल मॉडल” के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक बड़ा कदम बढ़ाया है।